Add

Monday, April 26, 2010

डॉ अनवर जमाल- अब बहुत हो गया.

प्रिय अनवर जमाल जी अब, अब बहुत हो गया । अब बहुत हो गया हिन्दू देवी देवातवो का मजाक। कंही ऐसा न हो की आप के सामने फिर समस्या कड़ी हो जय। मैंने तो पूरी कोशिश की आपको समझाने की लेकिन शायद मैं गलत था ।
हिन्दू इतना भी कमजोर नहीं है की वो अपनी रच्छा भी न कर सके। अगर हिन्दू जाग गया तो उसे शांत करने वाला भी कोई नहीं मिलेगा।
इसलिए अभी मैं , आप से विनम्र निवेदन करता हूँ की आप हिन्दू देवी देवातावो का मजाक उड़ना बंद कर दे। और अगर आप नहीं कर सकते तो ब्लोग्गिं बंद कर दे या । क्योंकि आप के लेख और आपके ब्लॉग पर बेहूदा टिप्पड़िया समाज के लिए घातक हैं।

Sunday, April 25, 2010

ना ही कोई हिन्दू देवी -देवता गलत हो सकता है और ना ही पैगम्बर मुहम्मद साहेब गलत हो सकते है और ना ही ईसा मशीह

आदमी वही अच्छा होता है जिसके अन्दर इंसानियत होती है। धर्म वो ही अच्छा होता है जिसके अन्दर समाज को जोड़ने की कला होती है। सिर्फ धार्मिक बनने या वेद कुरान का नारा लगाने वाला इन्सान कभी भी समाज के बारे मैं नहीं सोचेगा। वो तो सिर्फ अपने धर्म के बारे मैं ही सोचेगा। सिर्फ अपने धर्म को ही अच्छा कहेगा।
ना ही कोई हिन्दू देवी -देवता गलत हो सकता है और ना ही पैगम्बर मुहम्मद साहेब गलत हो सकते है और ना ही ईसा मशीह और ना ही वेद और गीता गलत है और ना ही कुरान और बाइबल। सब अपने -अपने ज़माने के महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ है। उस ज़माने मैं फैली हुई बुराइयों को दूर करने के लिए श्री कृष्ण का अवतार हुआ, ईसा मसीह और पैगम्बर मुहम्मद साहेब का अवतार हुआ। उन लोगो ने उस ज़माने मैं पुरे विश्व के कल्याण के लिए महतवपूर्ण योगदान दिया।
लेकिन आज के ज़माने मैं लोगो को क्या हो गया है। आज के लोग ज्यादा तर अपना समय सिर्फ दुसरे धर्मो को नीचा दिखाने मैं लगाते हैं। कोई कुरान को गलत बताता है तो कोई गीता और वेदों को गलत साबित करने मैं लगा हुआ है। कोई कुरान मैं फेर बदल से मना करता है तो कोई अपना समाज बदलने के लिए तैयार नहीं है।
मेरे पड़ोस मैं एक इसाई परिवार रहता है, किसी काम की वजह से थोड़ी देर पहले वो लोग मेरे पास ही बैठे थे , उसी दौरान उनके एक रिश्तेदार भी मेरे घर आ गए उनके रिश्तेदार ने मुझसे तो नमस्ते किया और उनसे जय मशीह कर के उनका अभिवादन किया। मैं आपका ध्यान जय मशीह शब्द पर दिलाना चाहता हूँ । इसाई समाज जय शब्द को कैसे इस्तेमाल कर रहा है , जबकि जय शब्द तो हिन्दू जाती से मतलब रखता है । लेकिन शायद इसाई धर्म गुरुवो को ये बात पता है की वो हिन्दुस्तानी है और हिन्दुस्तानी सभ्यता उनकी अपनी सभ्यता है। जबकि बाइबिल सिर्फ उस सभ्यता की बात करती जिस सभ्यता मैं उसका जन्म हुआ। लेकिन बाइबिल के उपदेश उनके लिए महत्तवपूर्ण है।
आगे और ................... जल्द ही ...................

Sunday, April 18, 2010

डॉ अनवर बड़ा या कुरान.

समाज के अन्दर फैली हुई बुराइयों को दूर करने के लिए ही लोगो ने धर्म का सहारा लिया । लेकिन समाज, समय के साथ बदलता रहा है। और जब समाज बदल सकता है तो धार्मिक कर्मकांड क्यों नहीं।

धर्म से समाज का जन्म कभी भी नहीं हुआ है, हाँ समाज से ही धर्म का जन्म हुआ है। आज से हजारो साल पहले की परम्परा को निभाना जरुरी है और जरुरी नहीं भी , देखना ये है की समाज को जरुरत किस चीज की है।

फिरदौस जी आपका कदम सराहनीय है । हम सब आपके साथ हैं। सतीश जी आपकी चिंता नाहक ही आपको परेशान कर रही है, अब आप और मैं बहुसंख्यक नहीं रहे। क्योंकि हमारे बीच से लोग निकलकर हमारा ही विरोध करते हैं।

ये कंही अरब से इम्पोर्ट तो हुए नहीं हैं। इनकी सारी पुश्ते राम-राम करती रही। मगर क्या करे इनके बाप दादा तो ठहरे अनपढ़ गंवार, अपने पुरे खानदान मैं तो येही तीनों पढ़े लिखे निकले, और पढ़े भी तो क्या गीता और ved जिसके खानदान मैं कभी किसी ने संस्कृत न बोला हो वो आज संस्कृत के श्लोको का हिंदी मैं अनुवाद करके लोगो को बता रहा है।

कुरान तो ये पढ़ नहीं सकते क्योंकि इन्हें अरबी पढनी नहीं आती, हाँ अरब के लोग कैसे जीते हैं वो जरुर इन्हें अच्छी तरह से आता है।

अनवर जमाल तो कभी हरिद्वार आयेंगे नहीं , सलीम खान साहेब को एक बार फ़ोन किया मैंने तो उस दिन के बाद उनका फ़ोन ही बंद जा रहा है। अब एक दिन इस कैरंवी का हालचाल पता करता हूँ की ये जनाब कितने पानी मैं हैं.

Wednesday, April 14, 2010

अल्लाह ने जन्नत मैं भी पूरा इंतजाम कर रखा है। शबाब और शराब दोनों मिलेगी.

मैं तो सिर्फ हसूंगा ........................ हा ! हा ! हा ! , ही ! ही ! ही ! , हु हु हु , हे हे हे, हो हो हो यार अब तो हद हो गई .

अल्लाह ने जन्नत मैं भी पूरा इंतजाम कर रखा हैमुझे तो सिर्फ हंसी रहीये लेख फिरदौश जी के ब्लॉग से उठाया है मैंने, फिरदौश जी ke ब्लॉग पर कुछ मुसलमान ब्लोगेर बंधू लोगो ने इस बात को स्वीकार है :-

"…जमात में तो यह बताया गया होगा की गैर-मुस्लिम को मुसलमान बनाने में दस हज का सवाब मिलता है…"...यह बात "बहुत कुछ" बयान करती है… (मंसूबे भी, नीयत भी…)

हम उन्हें 'कलमा' पढ़ा लेंगे... इससे हमें दस हज का सवाब मिलेगा... और मरने के बाद जन्नत...जन्नत में 72 हूरें मिलेंगी, जन्नती शराब मिलेगी...

मैं तो सिर्फ हसूंगा ........................ हा ! हा ! हा ! , ही ! ही ! ही ! , हु हु हु , हे हे हे

जो कहना hai आप लोग कहिये................................................

Tuesday, April 13, 2010

अनपढ़ मुसलमान अभी भी गुमराह हुए पड़े है.

मुसलमान गुमराह हो गए हैं। इसमें कोई शक नहीं है। गुमराही का ही नतीजा है की कुछ ब्लोगेर अनाप -शनाप बके जा रहे हैं। किसी भी धर्म के बारे में, कभी भी बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देना इनकी आदत बन गई है। क्योंकि इन्होने तो कुरान को भी सही तरीके से नहीं पढ़ा है। जो लोग कुरान को सही तरीके से पढ़ चुके हैं उन्हें तालिबानी कहते है। इन्हें क्या कहे ?
अरबियन समाज जो की सदियों तक कबीलाई जिंदगी जीता रहा है। खाने के लिए जानवर और खजूर के अलावा कभी कुछ और तो मिला नहीं। एक ही दातून से पूरा महीना निकाल देना। आखिर करते भी क्या खजूर के पेड़ से दातून तो बनती नहीं । कभी -कभार कोई व्यापारी आ गया दातून बेचने, उसी से काम चला लेते थे । लेकिन आज के ज़माने में हिन्दुस्तानी मुल्लावो में ये प्रथा पूरी तरह से विद्यमान है। जबकि हिंदुस्तान में तो नीम और बबूल की खान ही है।
इस्लाम के जन्म से पहले ही अरब समाज में मरे हुए इन्सान को जमीन में दफ़न कर देने की प्रथा थी। क्योंकि अरब में जंगल नहीं थे। हिंदुस्तान में मरे हुए इंसानों को दफ़न भी किया जाता है और जलाया भी जाता है।
कुछ लोगो ने अज्ञानी अरबियों को चमत्कार दिखा करके भ्रमित कर दिया । आज पूरी दुनिया के पढ़े लिखे मुसलमान भी कुरान से ऊपर नहीं सोच पा रहे हैं। समुद्र से मूंगा और मोती निकलना कोई चमत्कार कैसे हो सकता है। (सूरा ५५, पेज ७४०)
हरे - भरे बाग़ और नहरों का लालच दे कर के मुसलमान बना दिया गया ।
इस्लाम के जन्म से पहले भी अरब समाज में भगवान् को अल्लाह कहते थे।

Saturday, April 10, 2010

सलीम साहेब पहले तो आप खुद एक अच्छा मुसलमान बन कर के दिखाइए

सलीम साहेब पहले तो आप खुद एक अच्छा मुसलमान बन कर के दिखाइए उसके बाद अपने उन सारे भाई बंधू लोगो को सही इस्लाम की शिक्षा दीजिये , जिनके अन्दर सिर्फ कुरान -कुरान भरा पड़ा हैअरे कंही से तो इन्सान भी नज़र आवोकुरान और मोहम्मद साहेब से पहले भी दुनिया थी और शायद आज से ज्यादा ही खुबसूरत थीकुरान तो सिर्फ अरबियन समाज के इर्द गिर्द ही घुमती है लेकिन कुछ तो क़द्र करो अपनी मातावो और अपनी बहनों काकुछ तो क़द्र करो अपने देश के संविधान काकुछ तो क़द्र करो अपने पूर्वजो का

तुम्हे गाय के मूत्र से इतनी दिक्कत होती है तो क्यों खाते हो आयुर्वेदिक और इंग्लिश दवाइयों कोक्या पता किसी और जानवर का मूत्र या हड्डी मिली हो किसी दवा मैं, और क्या पता वो जानवर तुम्हारे लिए हराम होगाय का मूत्र मिला प्रसाद खाने मैं आपको इतनी तकलीफ हो रही है , मगर जानवरों के मल-मूत्र की थैली मसाले के साथ पका कर के खाने मैं तो बड़ा ही आनंद आता होगा


अफगानिस्तान मैं सारे तालिबानियों से पूरी अफगान जनता परेशान हैंकश्मीर का आम आदमी पाकिस्तानी मुस्लिम आतंकवादियो से परेशान हैवो पाकिस्तान जिसने अपने देश मैं तालिबानियों के कहने पर इशलामिक कानून लागु किया , खुद ही अपने बुने जाल मैं फंस गया हैक्या वो लोग कुरान को नहीं मानते हैअगर नहीं मानते हैं तो फिर अपने आप को मुसलमान क्यों कहते हैंऔर अगर अपने आप को मुसलमान मानते हैं तो क्या कुरान उन्हें कत्ले आम की इजाजत देता हैक्यों पाकिस्तान और अफगानिस्तान मैं मुस्लिम महिलावो की स्थिति दिन प्रतिदिन बिगडती जा रही हैक्या वंहा पर आप जैसा कोई कुरान का विद्वान नहीं है क्या

मेरे प्रिय सलीम खान साहेब मेरे द्वारा कहे गए किसी भी शब्द को दिल पर मत लीजियेगा हाँ दिमाग पर जरुर लीजियेगा

अरे प्यार करना तो कोई हिन्दुस्तानियों से सीखेहम तो इंसानों के साथ -साथ जानवरों से भी प्यार करते हैंचिड़ियों, पेड़ पौधों से प्यार करते हैंनदियों , नालो, तालाबो और कुंवो से प्यार करते हैंमछलियों से प्यार करते हैंअपने देश की मिटटी से प्यार करते हैं , अपने देश के पर्वतों से प्यार करते हैंअपने उन पूर्वजो से प्यार करते हैं जिन्होंने हमें यह प्यार की राह दिखाई हैहम तो हर उस जीव और निर्जीव वस्तु से प्यार करते हैं जो इस संसार मैं कंही ना कंही विराजमान हैसच्चा प्यार ही सच्ची पूजा है, श्रीमान सलीम खान साहेबछोडिये ये वेद-कुरान और हिन्दू मुष्लिम का राग

आते ही चली जाती हो तुम -क्यों ? पार्ट- 2



आते ही चली जाती हो तुम -क्यों ?

आते ही तुम जाने की बातें करने लगती हो तुम, आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह कर दिया है तुम्हारे साथ कभी तो बोला करो कुछ तुम्हे तो अच्छी तरह से पता है की तुम जब आती हो मेरे घर में तो सब कितना खुश हो जाते हैं , चारो तरफ़ खुसी की लहर दौड़ जाती है, मेरे पड़ोसी भी कितने खुश हो जाते हैं की चलो दुबारा आई तो सही।

मेरे चहरे पर रौनक जाती है तुम्हे देख कर, मेरे घर का कोना कोना खिल उठता है, तुम्हारी आहट सुनकर। कितना आनंद आता है उस समय ये तो बस मुझे या मेरे बच्चो को पता है।

लेकिन तुम हो की रूकती ही नही, ना तो तुम्हारे आने का समय और ना ही तुम्हारे जाने का समय , तुम्हे क्या पता की तुम्हारे जाने के बाद मेरे बच्चे पुरी रात सो नही पाते और बच्चे ही क्यों में भी तो नही सो पता और सो भी कैसे जायें तुम जो नही होती। मेरी बीबी भी पुरी रात जग करके तुम्हारा इंतजार करती रहती है की तुम कब आओगी और हम सब कब अपना कूलर और पंखा चला कर के सोयें। और रात ही क्या दिन में भी तो तुम्हारी पुरी जरुरत होती है। तुम्हारे बिना तो ठंडा पानी भी नही मिलता पीने को।

कृपया मेरे पुरे परिवार पर तरस खावो तुम और अगर २४ घंटा नही रह सकती तो कम से कम १५-२० घंटा तो रुको, लेकिन तुम हो की -१० घंटे में ही निकल लेती हो। तुम्हारे घर अगर जा करके पता करे तो कोई भी आदमी सही जबाब नही देता तुम्हारे घर वालो के पास तो रता - रटाया बहाना होता की आज फलां मोहल्ले में तार टूट गई है या फलां मोहल्ले का ट्रांस्फोर्मेर ख़राब हो गया है।

हे बिजुली रानी कृपया मेरे ऊपर तरस खाएं और मेरे घर आयें तो कुछ समय मेरे बच्चो के साथ जरुर बिताएं।

Thursday, April 8, 2010

आखिर कब तक मुसलमान अपनी पहचान बताता फिरेगा।

आखिर कब तक मुसलमान अपनी पहचान बताता फिरेगाआखिर कब तकक्यों जरुरी है धर्म का प्रदर्शन करना क्या एक हिन्दू अगर अपने माथे पर तिलक नहीं लगाये गा तो क्या वो हिन्दू नहीं कहलायेगाक्या एक मुस्लमान अगर अपने सर पे टोपी नहीं लगाएगा तो क्या वो मुसलमान नहीं कहलायेगाक्या आज के ज़माने में भी जरुरी है की हम लोगो को ये बताये की हमारी जात क्या है ?

डॉ जाकिर नाइक जैसे कुछ आंतकवादी ( होने वाले ) कहते है कि, ये मुसलमानों तुम अपने सर पे टोपी लगावो और लम्बी दाढ़ी रखो जिससे कि अगर कोई तुम्हे देखे तो ये कहे कि देखो वो मुसलमान रहा है

क्या मिला मुसलमानों को मुसलमान बन कर केअपनी पहचान और छुपानी पड़ती है

आखिर क्या जरुरत है अपने - अपने धर्म का प्रदर्शन करने किकुछ लोग इसाई बने और कुछ लोग मुसलमान , लेकिन उनका क्या जो नास्तिक ही रह गएक्या बिगाड़ लिया उनका किसी धर्म ने

मेरे समझ से वो नास्तिक ही हैं जो सबसे मजे कि जिंदगी जी रहे हैं

मुद्दा ये है कि आखिर कब तक मुसलमान अपनी पहचान बताता फिरेगाकब तक मुसलमान अपने आपको सच्चा या कच्चा मुसलमान कहता फिरेगा

सबसे बड़ा मुसलमानों का दुश्मन भी मुसलमान ही है (शिया और सुन्नी )